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Friday, December 2, 2022
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Shraddha Murder Case: नार्को टेस्ट से पहले आफताब का होगा पॉलीग्राफ टेस्ट, क्या है दोनों में फर्क?

श्रद्धा वॉकर मर्डर केस के खुलासे हैरान करने वाले हैं। आज यानी 21 नवंबर को आफताब के नार्को टेस्ट होने की उम्मीद थी। लेकिन आज आफताब का नार्को टेस्ट नहीं होगा। मिली जानकारी के अनुसार, नार्को टेस्ट से पहले आफताब को पॉलीग्राफ टेस्ट से गुजरना होगा। पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए भी कोर्ट से परमिशन लेनी पड़ती है। पुलिस को कोर्ट से नार्को टेस्ट के लिए परमिशन तो मिल गया है लेकिन अभी पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए परमिशन मिलना बाकी है।

फोरेंसिक मनोविज्ञान विभाग के हेड डॉक्टर पुनीत पुरी ने बताया कि ‘नार्को टेस्ट से पहले हमें पॉलीग्राफ टेस्ट कराने की जरूरत है, जिसके लिए हमें सब्जेक्ट (आफताब) की रजामंदी चाहिए। कोर्ट ने नार्को टेस्ट की अनुमति दे दी है और पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए हम अभी अनुमति का इंतजार कर रहे हैं। एक बार अनुमति मिलने के बाद, बाकी सब कुछ 10 दिनों में किया जाएगा।’ तो आइए समझते हैं कि नार्को टेस्ट और पॉलीग्राफ टेस्ट में क्या फर्क है…

क्या होता है पॉलीग्राफ टेस्ट?
पॉलीग्राफ टेस्ट को आसान भाषा में लाई डिटेक्‍टर टेस्‍ट भी कहा जाता है। क्या आपने ध्यान दिया है कि झूठ बोलते वक्त हमारे शरीर में कई तरह के बदलाव आ जाते हैं? कुछ बदलाव जैसे कि पसीना आना, कपकपी होना तो हमें दिखते हैं लेकिन कई ऐसे बदलाव भी होते हैं जो शरीर के अंदर आते हैं। इन बदलावों को जानने के लिए एक मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। यह मशीन शरीर के अंदर आए बदलावों को मॉनिटर करती है।

झूठ बोलते वक्त शरीर के अंदर क्या बदलाव आते हैं?
भले ही आप कितने ही आत्मविश्वास के साथ झूठ क्यों न बोलें आपके शरीर में कई तरह के बदलाव आ जाते हैं। मसलन, आपका हार्ट रेट बढ़ने या घटने लगेगा, सांस लेने की स्पीड में भी बदलाव आ जाएगा, ब्लड प्रेशर में उतार चढ़ाव होने लगेगा, आदि। इस सभी बदलावों को एक मशीन के मॉनिटर पर देखा जा सकता है। इसके लिए सब्जेक्ट के शरीर पर कई तार लगाए जाते हैं। इन तारों से ही शरीर के अंदर की गतिविधि मॉनिटर की जाती है। एक बात घ्यान रहे, पॉलीग्राफ टेस्ट में सब्जेक्ट को किसी प्रकार की दवाई या इंजेक्शन नहीं दिया जाता है। वहीं नार्को टेस्ट में बेहोशी का इंजेक्शन दिया जाता है।

विशेषज्ञों की जरूरत
पॉलीग्राफ टेस्ट सिर्फ एक्सपर्ट ही कर सकते हैं। शरीर में होने वाले बदलावों को देखकर वो आसानी से बता देते हैं कि सब्जेक्ट सच बोल रहा है या झूठ। हालांकि कई बार यह भी देखा गया है कि यह मशीन सच और झूठ का अंतर नहीं पकड़ पाती। क्योंकि कुछ लोग झूठ बोलने के इतने आदी हो चुके होते हैं कि उनके शरीर में झूठ बोलते वक्त कोई बदलाव ही नहीं आता। लेकिन फिर भी पॉलीग्राफ टेस्ट से सच्चाई के और करीब पहुंचा जा सकता है।

पॉलीग्राफ टेस्ट कैसे नार्को टेस्ट से अलग है?
नार्को टेस्ट में ट्रुथ ड्रग दिया जाता है। जी हां, एक ऐसा ड्रग जिसको देते ही इंसान सच बोलने लगता है। ट्रुथ ड्रग में कई दवाइयां शामिल होती हैं। इन्हें इंजेक्शन के माध्यम से दिया जाता है। इथेनॉल और सोडियम पेंटाथॉल के साथ-साथ कई ऐसे इंजेक्शन लगाए जाते हैं जिससे इंसान आधी बेहोशी में चला जाता है। वहीं पॉलीग्राफ टेस्ट में कोई इंजेक्शन नहीं दिया जाता है।

आधी बेहोशी में पूछे जाते सवाल
ट्रुथ ड्रग देते ही इंसान आधी बेहोशी में चला जाता है। यानी न तो वो होश में है और न ही बेहोश। वो दोनों के बीच में कहीं है। ये स्थिति बहुत गंभीर होती है। इसीलिए एक्सपर्ट की टीम बनाई जाती है। आधी बेहोशी की हालत में इंसान झूठ नहीं बोल पाता। झूठ बोलने के लिए दिमाग को सोचना पड़ता है और कल्पना भी करना पड़ता है। ट्रुथ ड्रग देने के बाद इंसान के कल्पना करने की शक्ति खत्म हो जाती है। वह झूठ नहीं बोल पाता। आधी बेहोशी उसे सोचने ही नहीं देती।

बता दें कि श्रद्धा मर्डर केस के आरोपी आफताब का आज नार्को टेस्ट होने वाला था। लेकिन अब पहले उसका पॉलीग्राफ टेस्ट होगा फिर नार्को टेस्ट होगा। दोनों टेस्ट विशेषज्ञों द्वारा की जाती हैं। आफताब ने श्रद्धा की हत्या कर उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे। पूरे देश में इस केस को लेकर लोगों में एक रोष है। लोग चाहते हैं कि यह केस जल्दी सॉल्व हो और आरोपी को सजा मिले। ऐसे में यह देखना होगा कि पॉलीग्राफ टेस्ट और नार्को टेस्ट में और कितना समय लगता है।
 

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