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Thursday, January 27, 2022
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वैवाहिक दुष्कर्म: दूसरे भरोसेमंद रिश्तों से कैसे अलग है पति-पत्नी का विश्वास से जुड़ा रिश्ता? HC ने न्याय मित्र से पूछा

उच्च न्यायालय ने बुधवार को न्याय मित्र से जानना चाहा कि कैसे पति और पत्नी के बीच एक भरोसेमंद रिश्ता दो पक्षों के बीच विश्वास से जुड़े किसी भी अन्य रिश्ते से अलग है, जहां एक व्यक्ति दुष्कर्म के आरोपों का सामना करता है। न्यायालय ने कहा कि आईपीसी की धारा 375 के अपवाद को खत्म करने के लिए एक गुणात्मक फैसला लेने के लिए कोर्ट को इस निष्कर्ष पर पहुंचना होगा कि कैसे संबंधित कृत्य को दुष्कर्म के अपराध की श्रेणी में रखा जाए।

जस्टिस राजीव शकधर और सी. हरि. शंकर पीठ ने वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने की मांग से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान मामले में कानूनी राय देने के लिए नियुक्त न्याय मित्र राजशेखर राव से यह सवाल किया। भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में एक अपवाद का प्रावधान है, जिसके तहत 15 साल से अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा जबरन बनाए गए यौन संबंधों को दुष्कर्म के अपराध की श्रेणी से बाहर रखा गया है। 

इससे पहले, न्याय मित्र व वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव ने बुधवार को वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने की मांग का समर्थन किया। उन्होंने पीठ से आईपीसी की धारा 375 के अपवाद को खत्म करने की वकालत की। राव ने पीठ को बताया कि जहां तक कानून का सवाल है तो एक महिला की स्थिति तब काफी बेहतर होती है, जब उस पर किसी अजनबी द्वारा यौन हमला किया जाता है, लेकिन जब उसका पति उस पर जबरन यौन हमला करता है, तो कानून कहता है कि उस कृत्य को वह दुष्कर्म कहने की हकदार नहीं है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस सी. हरि शंकर ने कहा कि ‘आप विश्वास और भरोसेमंद रिश्ते के पहलू पर चले गए, आपको दो बिंदुओं का उत्तर देना है। एक, इन शब्दों का प्रयोग कानून में इस बात को ध्यान में रखते हुए किया जाता है कि अपवाद पर है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे मामले में भरोसा करें जहां स्कूल में चौकीदार, शिक्षक या छात्र आदि, ये विश्वास की एक श्रेणी हैं, क्या आप कह सकते हैं कि यह कुछ ऐसा है जो यौन संबंधों में पति और पत्नी के बीच मौजूद भरोसे के समान है? उन्होंने न्याय मित्र से कहा कि आपको इसका जवाब देना होगा।’ 

पीठ ने कहा कि यह कहते हुए कि कोई भी बच्चा या कोई अन्य व्यक्ति किसी व्यक्ति की देखरेख में एक भरोसेमंद संबंध में दूर से भी उम्मीद नहीं कर सकता है कि दूसरा व्यक्ति यौन संबंध बनाने की कोशिश करेगा। साथ ही कहा कि हम इस बात से चिंतित हैं कि क्या पति द्वारा जबरन बनाए यौन संबध को दुष्कर्म की श्रेणी में रखकर सजा दिया जाना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि ऐसा नहीं है कि विधायिका ने कानून बनाते वक्त यह विचार किया था कि ऐसे मामले में आपराधिक दंड नहीं दिया जाना चाहिए, लेकिन विधायिका ने फैसला किया था कि इसे दुष्कर्म नहीं माना जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि यदि हमें इसे धारा 375 के अपवाद को खत्म करना है, तो हमें एक गुणात्मक निर्णय लेना होगा कि इस अधिनियम को भी दुष्कर्म के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए।’

उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि दोनों स्थितियों की बराबरी नहीं की जा सकती तो अपवाद को किस हद तक खत्म किया जा सकता है, इस पर विचार करना होगा। उच्च न्यायालय आईपीसी की धारा 375 के अपवाद को खत्म करके वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने की मांग को लेकर गैर सरकारी संगठनों आरआईटी फाउंडेशन, ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन्स एसोसिएशन और दो व्यक्तियों की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। 

केंद्र सरकार ने 2018 में हलफनामा दाखिल करते हुए कहा था कि वैवाहिक बलात्कार को आपराधिक अपराध नहीं बनाया जा सकता क्योंकि यह एक ऐसी घटना बन सकती है जो विवाह की संस्था को अस्थिर कर सकती है और पतियों को परेशान करने का एक आसान साधन बन सकती है। मामले की सुनवाई के दौरान न्याय मित्र ने कई उदाहरण देकर भी पीठ को बताने का प्रयास किया। उन्होंने रिश्ते के विभिन्न चरणों को भी पीठ के समक्ष रखा। मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।

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