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Thursday, January 20, 2022
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बसपा के सामने खोई ताकत पाने की बड़ी चुनौती, कितना कारगर होगा सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला

यूपी विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। पार्टियां जहां जीत के लिए नए फार्मूले पर काम कर रही है, वहीं बसपा 15 साल पुराने सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर मैदान में उतरने की रणनीति पर काम कर रही है। उसकी यह रणनीति कितना कारगर साबित होती है यह  समय बताएगा पर उसके सामने खोई हुई ताकत पाने की बड़ी चुनौती होगी।

फिर ब्राह्मणों के सहारे
तिलक तराजू और तलवार का नारा देने वाली बसपा ने वर्ष 2007 के चुनाव में हाथी नहीं गणेश हैं ब्रह्मा विष्णू महेश का नारा दिया। बसपा ने दलित और ओबीसी के हटकर नया दांव खेला। बसपा ने पहली बार पार्टी में ब्राह्मणों को आगे बढ़ाया और सर्वाधिक टिकटें दी। बसपा ने वर्ष 2007 में 89 दलित उम्मीदवार उतारे और दूसरे नंबर पर 86 ब्राह्मणों को टिकट दिया। इस चुनाव में बसपा के 41 ब्राह्मण विधायक जीत कर आए। वर्ष 2007 में ही बसपा ने अपने दम पर सरकार बनाई। उस समय बसपा का वोटिंग प्रतिशत 30.43 फीसदी था और सीटें 206 मिली थीं। मायावती इस बार फिर उसी फार्मूले को लेकर आगे बढ़ रही हैं। इस बार 100 के करीब ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारने की योजना पर काम चल रहा है।

धार्मिक एजेंडा भी साधा
बसपा सुप्रीमो मायावती इस बार कुछ हटकर काम कर रही हैं। जैसे- धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए अयोध्या से प्रबुद्ध वर्ग संवाद की शुरुआत की। काशी और मथुरा पर भी चर्चा की गई। बसपा के बैनर पर परशुराम और श्रीराम दिखाई दिए। सभाओं की शुरुआत शंख की ध्वनी और मंत्रोच्चार के साथ हुआ। बसपा सुप्रीमो ने इतना ही नहीं यह भी साफ किया कि इस बार वह पार्क व स्मारक नहीं बनवाएंगी। यह काम पूरा हो चुका है। उनका अब पूरा ध्यान प्रदेश के विकास पर केंद्रित होगा। इसका मतलब साफ है, वह यह बताना चाहती हैं कि अब वह सर्व समाज के लिए काम करेंगी। 

क्या है सोशल इंजीनियरिंग
साल 2007 के चुनाव में उतरने के लिए बसपा ने एक साल पहले ही उम्मीदवारों की घोषणा कर दी गई थी। उम्मीदवारों को अपने क्षेत्र में दौरा करने का पर्याप्त मौका दिया। उस समय राजनीतिक पंडितों को शुरुआत में बसपा की यह सोशल इंजीनियरिंग कामयाब होती नहीं दिख रही थी, लेकिन जब चुनाव के नतीजे आए तो सब चौंकने को मजबूर हुए। बसपा के इस फार्मूले का उपयोग आगे चल कर अन्य दलों ने भी किया। ब्राह्मण मतदाता जिस अनुपात में अन्य पार्टियों से जुड़े, उस अनुपात में उन्हें सफलता भी मिली। साल 2012 में समाजवादी पार्टी ने भी ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने का अभियान चलाया। इस चुनाव में सपा के 21 ब्राह्मण उम्मीदवार विधायक चुने गए थे। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सवर्णों के साथ गैर जाटव दलित और गैर यादव ओबीसी बैंक को साधकर एक अजेय सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला ईजाद किया।

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