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Thursday, June 30, 2022
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तेल महंगा होने से दुनिया कैसे मंदी की चपेट में आती है, समझिए पूरा गणित

1970 के दशक से तुलना करें, तो अब की दुनिया पेट्रोलियम पर कम निर्भर है। लेकिन, यूक्रेन युद्ध ने बता दिया है कि तेल में दुनिया की अर्थव्यवस्था और राजनीति को अब भी हिला देने की ताकत है।1973 में जब योम किप्पुर की जंग ने अरब देश पर तेल से जुड़े प्रतिबंध लगाए, तो दुनियाभर के बाजारों में महंगाई की दर दो अंकों में पहुंच गई। उस वक्त दुनिया में इस्तेमाल हो रही ऊर्जा का आधा हिस्सा सिर्फ तेल से आ रहा था।अब यह आंकड़ा सिमटकर लगभग एक तिहाई पर आ गया है। 

एक बैरल तेल से कितना विकास

अमीर देशों ने सेवाओं को ज्यादा महत्व दिया। फैक्ट्रियां अब ज्यादा कुशल हैं और बिजली के उत्पादन में तेल के बजाय कोयले और गैस का ज्यादा इस्तेमाल होने लगा है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने पिछले साल एक अध्ययन किया था, जिससे पता चला कि आधी सदी में जितने आर्थिक विकास के लिए एक बैरल तेल की जरूरत पड़ती थी, उतना काम अब आधे बैरल से कम तेल में हो सकता है।

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कुछ विश्लेषकों ने तो हाल के वर्षों में यह अनुमान भी लगाया कि दुनिया की अर्थव्यवस्था भविष्य में अपनी तेज रफ्तार से तेल उद्योग को हैरत में डाल सकती है। कुछ अन्य लोगों ने कोविड-19 की वजह से हुई तालाबंदी के दौरान ध्यान दिलाया कि बहुत कम तेल का उपयोग करके अर्थव्यवस्था कैसे चलेगी। हालांकि, 2021 में जब तेल की मांग लौटी और यूक्रेन युद्ध के बाद जिस तरह से तेल की कीमतें बढ़ीं हैं, उससे साफ हो गया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को तेल से मुक्त कराने में अभी कई दशकों तक कोशिशें करनी होंगी।

भारी निवेश की जरूरत

कम समय में तेल की मांग को घटाना बहुत मुश्किल है। इसके लिए सैकड़ों खरब डॉलर की जरूरत होगी, जिससे कि बुनियादी ढांचे की जो विरासत है, उसे सिरे से बदला जाए। जैसे- गाड़ियां और उपकरण।

रसायन और तेल बाजारों से जुड़ी कंसल्टेंसी फर्म वुड मैकेंजी के वाइस प्रेसिडेंट एलन गेल्डर कहते हैं, “आर्थिक गतिविधियों और तेल की मांग के बीच जो संबंध है, उसे घटाने के लिए निवेश करने की जरूरत है।” तेल की कीमतों में इस साल की शुरुआत से 50 फीसदी की तेजी आ चुकी है। पिछले साल जब कीमतें बढ़ीं, तो दुनियाभर के सेंट्रल बैंकों ने यह कह कर सांत्वना दी कि यह सब महामारी के दौर में जो प्रोत्साहन के पैकेज दिए गए, उनकी वजह से है और तात्कालिक है। अब तेल की ताजा बढ़ी कीमतों ने उस उम्मीद को ध्वस्त कर दिया है कि महंगाई की बढ़ी दर तात्कालिक है। वास्तव में इसने तो यह बिल्कुल साफ कर दिया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के अंदरूनी तंत्र में तेल कितनी गहराई तक घुसा हुआ है।

पेट्रोल पंप की नाराजगी

अमेरिका के लोग गाड़ी कम चला रहे हैं और एयरलाइनें ज्यादा किराया वसूल रही हैं। आज पूरी दुनिया में आम लोगों को तमाम चीजों के लिए जो ऊंची कीमत देनी पड़ रही है, उसके पीछे कारण है युद्ध की वजह से तेल की सप्लाई या कीमत पर पड़ा असर। प्लास्टिक या फिर उर्वरकों के लिए जरूरी पेट्रोकेमिकल से लेकर दुनिया के कोने-कोने तक सामानों को पहुंचाने में इस्तेमाल होने वाला ईंधन या फिर कच्चा तेल काफी महंगा हो गया है।

अमेरिका में संघीय एजेंसियों का आकलन है कि प्रति बैरल तेल में 10 डॉलर की बढ़ोतरी से जीडीपी ग्रोथ 0.1 फीसदी घट जाती है और महंगाई 0.2 फीसदी बढ़ जाती है। इसी तरह यूरोपीय केंद्रीय बैंक के रिसर्च के मुताबिक यूरोजोन में तेल की कीमत 10 फीसदी बढ़ने का असर महंगाई में 0.1 से 0.2 अंकों तक इजाफे में दिखता है।

निस्संदेह इसका सबसे ज्यादा असर पेट्रोल पंपों पर दिखता है। यूरोप में तेल आयात करने वाले देश गाड़ी चलाने वालों को ईंधन में छूट और दूसरी रियायतें दे रहे हैं। ध्यान रखिए कि इन लोगों का गुस्सा कभी भी उबलकर सड़कों तक पहुंच सकता है। जैसा फ्रांस ने 2018 में येलो वेस्ट मूवमेंट के दौरान देखा था। दुनियाभर में तेल की सबसे ज्यादा मांग एशिया में है। यहां सबसे तेज विकास की भी जरूरत है। एशिया पर भी तेल की बढ़ी कीमतों का बहुत असर हुआ है। जापान और दक्षिण कोरिया ने ऊंची कीमतों से राहत देने के लिए सब्सिडी बढ़ा दी है।

दुनिया में तेल का सबसे बड़ा उत्पादक देश अमेरिका इस स्थिति से दूसरों के मुकाबले थोड़ा बेहतर तरीके से निपट सकता है। फेडरल रिजर्व के प्रमुख जेरोमी पॉवेल में सोमवार को ध्यान दिलाया कि उनका देश निश्चित रूप से 1970 के दशक की तुलना में अब तेल के सदमे को सहने के लिए बेहतर स्थिति में है। हालांकि, इसके बाद भी वह बेहिसाब बढ़ती महंगाई के खिलाफ अपना अब तक का सबसे कठोर संदेश देने से नहीं रोक पाए। उन्होंने साफ कहा कि सेंट्रल बैंक तेजी से ऊपर जाती कीमतों का बोझ लोगों पर पड़ने से रोकने के लिए “ज्यादा आक्रामक तरीके से” काम कर सकता था।

महंगा है पीछा छुड़ाना

दुनिया की ऊर्जा जरूरतों में तेल की हिस्सेदारी 45 फीसदी से घटाकर 31 फीसदी तक लाने में 50 साल लग गए। ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि जीरो कार्बन अर्थव्यवस्था बनने की कोशिश में जुटे देश तेल की इस हिस्सेदारी को और घटाने में कितना समय लेंगे। गाड़ी चलाने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ जाकर दुनियाभर में तेल की मांग को बहुत प्रभावित कर सकते हैं। दुनिया में जितना तेल इस्तेमाल किया जाता है, उसका एक चौथाई सवारी गाड़ियों में खर्च होता है।

ऊर्जा सलाहकार फर्म डीएनवी के कार्यक्रम निदेशक सेवेरे आलविक का कहना है, “फिलहाल जो तेल कीमतों की तीव्रता है, वह तेजी से गिरेगी। अगले कुछ सालों में तेल की मांग अपने चरम पर पहुंच जाएगी, उसके बाद यह नीचे आएगी, जबकि जीडीपी उसके बाद भी बढ़ती रहेगी।” डीएनवी का मानना है कि अगले 10 सालों में इलेक्ट्रिक गाड़ियां 50 फीसदी तक पहुंच जाएंगी।

हालांकि, यह कहानी का सिर्फ एक पहलू है. तेल की मांग एशिया में बढ़ती रहेगी। इसके अलावा शिपिंग, विमानन और माल की ढुलाई के साथ ही पेट्रोकेमिकल्स का क्षेत्र सवारी गाड़ियों की तरह वैकल्पिक ईंधन को इतनी जल्दी नहीं अपना सकेगा। यानी एक बहुत बड़े क्षेत्र में तेल की मांग पहले जैसी ही रहेगी या फिर बढ़ेगी. 2019 में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी आईईए के एक विश्लेषक ने कहा था, “हमारे अनुमान बताते हैं कि तेल पर निर्भरता तुरंत खत्म होने के आसार नहीं हैं। खासतौर से आयातित तेल पर। दुनिया तेल की सुरक्षा से चिंतामुक्त होने के बारे में नहीं सोच सकती।”

इस तरह की संभावनाएं बता रही हैं कि सब कुछ मनमाफिक और बढ़िया रहे, तो भी तेल या दूसरे जीवाश्म ईंधन से पीछा छुड़ाने का मतलब आम लोगों या नीतियां बनाने वालों के लिए चुनौतियों से छुटकारा नहीं है।

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