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Saturday, January 22, 2022
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RLD को सिर्फ एक सीट पर मिली थी जीत, लड़ने को कैसे मिलेंगी 40, अखिलेश को साध पाएंगे जयंत?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के बीच गठबंधन हो चुका है, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर अब तक पेंच फंसा हुआ है। सीट शेयरिंग पर दोनों ही पार्टियां इस समय अपने-अपने स्टैंड पर अड़ी हुई हैं और अखिलेश यादव की चौधरी जयंत सिंह से मुलाकात पर नजरें टिकी हुई हैं।  वेस्ट यूपी आरएलडी का गढ़ है, लेकिन पिछले कुछ चुनाव नतीजे पार्टी के लिए बेहद निराशानजक रहे हैं और यही वजह है कि जयंत के लिए अखिलेश से 40 सीटें लेना आसान नहीं होगा।

2017 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो आरएलडी ने तब 277 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन 266 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। पार्टी के एकमात्र उम्मीदवार सहेंदर सिंह रमाला को छपरौली विधानसभा सीट से जीत मिली थी। 

जनता दल से अलग होकर 1996 में बनी पार्टी के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव में  जिस बुरे दौर की जो शुरुआत हुई वह अब तक कायम है। उस चुनाव में पार्टी के 8 में से 6 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। पार्टी को राज्य में महज 0.86 फीसदी वोट हासिल हुए थे। पार्टी संस्थापक अजित चौधरी और उनके बेटे जयंत चौधरी को भी हार का सामना करना पड़ा था।

2 साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी पार्टी के प्रदर्शन में सुधार नहीं हो पाया। 2019 के लोकसभा चुनाव में महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ने के बावजूद आरलेडी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है और पार्टी के सभी उम्मीदवार हार गए। खुद चौधरी अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी को मुजफ्फरनगर और बागपत लोकसभा सीट से चुनाव हार गए। 

मुजफ्फनगर के दंगों के बाद शुरू हुआ बुरा वक्त
जाटलैंड की पार्टी कही जाने वाली आरएलडी का खराब वक्त 2013 में मुजफ्फनगर दंगों के बाद शुरू हुआ। दंगों के बाद जिस तरह यहां ध्रुवीकरण हुआ उससे जहां भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने यहां अपनी जड़ें मजबूत कर लीं तो आरएलडी को सबसे अधिक नुकसान हुआ। हिंदू और मुस्लिम की मिश्रित आबादी वाले वेस्ट यूपी में पिछले तीन चुनाव के नतीजे इस बात की तस्दीक करते हैं।

इस बार क्यों है पार्टी को अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद?
वेस्ट यूपी गन्ने की खेती के लिए मशहूर है। यहां की बड़ी आबादी कृषि पर ही निर्भर है। मोदी सरकार की ओर से लाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में वेस्ट यूपी किसान आंदोलन का गढ़ बना रहा। पार्टी नेताओं का मानना है कि किसान आंदोलन ने जाटों और मुसलमानों में पैदा हुई खाई को पाट दिया है और एक बार फिर वह अपने वोट बैंक को वापस हासिल करने में कामयाब रहेगी। यही वजह है कि पार्टी सपा से गठबंधन में 40 से कम सीटों पर मानने को तैयार नहीं है।

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