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Thursday, June 30, 2022
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काशी विश्वनाथ मंदिर ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू, सर्वेक्षण पर उच्च अदालत ने लगाई है रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट में काशी विश्वनाथ मंदिर और इससे सटी ज्ञानवापी मस्जिद के विवाद को लेकर दाखिल याचिकाओं की सुनवाई गुरुवार को प्रारंभ हो गई। अंजुमन इंतजामिया मस्जिद वाराणसी की तरफ से दाखिल याचिका व अन्य याचिकाओं की सुनवाई न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया कर रहे हैं। हाईकोर्ट ने मंदिर परिसर के सर्वे कराने के वाराणसी की अदालत के आदेश पर रोक लगा रखी है। 

सुनवाई के दौरान विश्वेश्वर नाथ मंदिर के अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने अतिरिक्त लिखित बहस दाखिल की और कहा कि याची ने सीपीसी के आदेश सात नियम 11डी के तहत वाद की पोषणीयता पर आपत्ति अर्जी दाखिल की थी। लेकिन उसपर बल न देकर ज़वाबी हलफनामा दाखिल किया है।

कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनकर वाद बिंदु तय किए हैं। उनका कहना है कि संपत्ति लार्ड विश्वेश्वर मंदिर की है, जो सतयुग से विद्यमान है। ग्राउंड फ्लोर पर मंदिर का कब्जा है। पूजा अर्चना जारी है। स्वयंभू लार्ड विश्वेश्वर स्वयं विराजमान हैं, जो 15वीं सदी के मंदिर का हिस्सा है। जमीन की प्रकृति भी धार्मिक है। वहां 15 अगस्त 1947 को पूजा होती थी, जो अब भी जारी है। इसलिए प्लेस आफ वर्शिप एक्ट 1991 इस पर लागू नहीं होगा। समय की कमी के कारण बहस पूरी नहीं हो सकी। अब 29 मार्च को बहस जारी रहेगी।

निचली अदालत ने दिया था मस्जिद की जमीन का सर्वेक्षण का आदेश
8 अप्रैल 2021 को वाराणसी के सीनियर डिवीजन सिविल जज ने वाद मित्र की याचिका पर पुरातात्विक सर्वेक्षण का आदेश दिया था। एएसआई से खुदाई कराकर सर्वेक्षण के जरिए हकीकत का पता लगाने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी बनाने को कहा था।

मुस्लिम पक्षकारों ने सिविल जज के इस आदेश पर असहमति जताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। मस्जिद की इंतजामिया कमेटी और यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने इस आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी। अदालत ने 1991 में दायर मुख्य मुकदमे की कार्यवाही पर भी अगली सुनवाई तक रोक लगाई थी। 

यह है पूरा मामला
ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण और हिंदुओं को पूजा पाठ करने का अधिकार देने आदि को लेकर वर्ष 1991 में मुकदमा दायर किया गया था। मामले में निचली अदालत व सत्र न्यायालय के आदेश के खिलाफ 1997 में हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट से कई वर्षों से स्टे होने से वाद लम्बित रहा।

10 दिसंबर 2019 में प्राचीन मूर्ति स्वयंभू लार्ड विश्वेश्वर के वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी ने सिविल जज सीनियर डिविजन (फास्ट ट्रैक कोर्ट) आशुतोष तिवारी की अदालत में आवेदन देकर अपील की थी कि ढांचास्थल के पुरातात्विक सर्वेक्षण के लिए निर्देशित किया जाये। दावा किया कि ढांचा के नीचे काशी विश्वनाथ मंदिर के पुरातात्विक अवशेष हैं। 

अपील में कहा गया कि मौजा शहर खास स्थित ज्ञानवापी परिसर के 9130, 9131, 9132 रकबा नं. एक बीघा 9 विस्वा लगभग जमीन है। उक्त जमीन पर मंदिर का अवशेष है। 14वीं शताब्दी के मंदिर में प्रथमतल में ढांचा और भूतल में तहखाना है। इसमें 100 फुट गहरा शिवलिंग है। मंदिर हजारों वर्ष पहले 2050 विक्रमी संवत में राजा विक्रमादित्य ने, फिर सतयुग में राजा हरिश्चंद्र और 1780 में अहिल्यावाई होलकर ने जीर्णोद्धार कराया। 

यह भी कहा गया कि 100 वर्ष तक 1669 से 1780 तक मंदिर का अस्तित्व ही नहीं रहा बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास के विभागाध्यक्ष एएस अल्टेकर ने बनारस के इतिहास में लिखा है कि प्राचीन विश्वनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग 100 फीट का था। अरघा भी 100 फीट का बताया गया है। लिंग पर गंगाजल बराबर गिरता रहा है, जिसे पत्थर से ढक दिया गया। यहां शृंगार गौरी की पूजा-अर्चना होती है। तहखाना यथावत है। यह खुदाई से स्पष्ट हो जाएगा। 

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