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Monday, September 26, 2022
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इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश- SC/ST एक्ट और रेप केस में उम्र कैद नहीं, 25 साल काफी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 3 (2)(5) के तहत सजा सुनाने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि अभियुक्त यह जानता था कि जिसके साथ वह अपराध कर रहा है वह दलित वर्ग का है और इसी कारण उसके साथ अपराध कर रहा है। इसी के साथ कोर्ट ने रेप और एससी-एसटी एक्ट में उम्रकैद की सजा रद्द कर दी है। रेप के आरोप में भी अभियुक्त की जेल में बिताई गई 25 वर्ष की अवधि को सजा के लिए पर्याप्त माना और अभियुक्त को बरी करने का आदेश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्र एवं न्यायमूर्ति एसएस प्रसाद की खंडपीठ ने बस्ती के मनीराम चौधरी की अपील पर सुनवाई के बाद दिया है। 

अपीलार्थी के खिलाफ बस्ती के कप्तानगंज थाने में 9 दिसंबर 2002 को एफआईआर दर्ज कराई गई थी कि उसने स्कूल से घर लौट रही 12 वर्षीय दलित छात्रा से रेप किया था। यह एफआईआर छात्रा की शिकायत पर उसके परिवार वालों ने उसी दिन थाने में दर्ज कराई। मेडिकल परीक्षण में छात्रा से रेप की बात साबित हुई। बाद में सेशन कोर्ट बस्ती ने 21 मई 2004 को मनीराम को नाबालिग दलित छात्रा से रेप का दोषी ठहराते हुए रेप व एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(5 )के तहत अलग-अलग उम्रकैद की सजा सुनाई। साथ ही उस पर 20 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया। 

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सेशन कोर्ट के फैसले के विरुद्ध अपील में अपीलार्थी के वकील का कहना था कि उस पर एससी/एसटी एक्ट के तहत कोई अपराध साबित नहीं होता क्योंकि अभियुक्त यह नहीं जानता था कि पीड़िता दलित है। कहा गया कि अभियोजन ने यह साबित करने के लिए कोई प्रमाण नहीं दिया गया कि अभियुक्त ने यह जानते हुए छात्रा से रेप किया कि वह दलित है। सीआरपीसी की धारा 313 के बयान में भी अपीलार्थी इस बाबत जिरह नहीं की गई। 

खंडपीठ ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(5) के तहत सजा देने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि अभियुक्त ने यह जानते हुए अपराध किया कि पीड़िता दलित है और अभियुक्त ने यह अपराध भी इसी कारण किया है। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में यह साबित करने के लिए अभियोजन ने कोई साक्ष्य नहीं दिया है। अभियुक्त से भी इस धारा के तहत आरोपों में कोई जिरह नहीं की गई जिससे उसे अपने बचाव का अवसर नहीं मिल सका।

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